रात चुपके से उतर आयी मेरे आंगन मे
लाख कोशिश की मगर राज समझ न पाया।
कर तेरी याद
रात भर रोया
गिनता तारे रहा
उदासी में नहीं सोया
प्रात सूर्योदय की बात समझ न पाया
दिन गुजरते गए
वर्ष मास बना
कितनी उदासी में मैने
जिंदगी का ख्वाब बुना
कौन रोता है आखिर
मेरे घर के पिछवाड़े हर शाम
लाख निगरानी की मगर आवाज समझ न पाया
थके सूरज ने
शाम को ली अंगड़ाई
रात फिर मेरे आंगन में उतर आयी
सोचता हूँ मिली मुझे
उपलब्धियां-विफलताऐं कितनी
मगर यह बात आज तक समझ न पाया
रात चुपके से उतर आयी मेरे आंगन में।
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मंगलवार, 19 अगस्त 2008
हत्यारा सूरज
उजला हत्यारा सूरज
सांझ को ढ़ेरों लहू बिखेर
झाड़ झंखाड़ो में खुद का तन छिपाता,
एकाएक खो जाता है
समंदर की अतल गहराइयों में
छटपटाहट और चीखें
दबाने के लिए झींगुर छेड़ देते हैं अपना राग
पक्षी, मुंह मांगी मुरादें पा·र
मौन साध जाते हैं,
रात-रातों-रात
सारा खून साफ·र
शिनाख्त मिटा
सुबह फिर पेश करती है
अपने बहुत 'पाक -साफ सूरज को
फिर भी कानो-कान
फैल ही जाती है सच्चाई
जिसे विपक्षी अफवाहें और
उजाला धूमिल करने का
कुचक्र बताता
उलटे आग बबूला हो जाता है सूरज
पक्षी मधुर आवाज में
राग सुनाने लगते है,
नारे लगाते हैं और निरीह जानवर
और जयकारा से गूँज जाता है सारा जंगल
लेकिन फिर-
चकाचौध उजाला बिखेर देने के बाद
अनुभवी चोरों की तरह
शहर की बिजली काट
लंबा गोल माल कर
फिर से गोल हो जाता है सूरज
और रात फिर अपने सूरज को
अपने आंचल में छिपा
काली शाल फेंकती है
धरती पर
ताकि सब सो जाये
मगर इधर
जब से चौकन्ना रहने लगा है
आदमी
निगहबानी करने लगी है दिशाऐं
सूरज डरने लगा है
बेनकाब होने से
और रात भी
आशंकित रहने लगी है
अपने फरेब की
नाकायमाबी पर
आखिर कब तक अपनी काली शाल के सहारे
वह भी बचा पाऐगी
अपने सूरज को
कब तक ?
सांझ को ढ़ेरों लहू बिखेर
झाड़ झंखाड़ो में खुद का तन छिपाता,
एकाएक खो जाता है
समंदर की अतल गहराइयों में
छटपटाहट और चीखें
दबाने के लिए झींगुर छेड़ देते हैं अपना राग
पक्षी, मुंह मांगी मुरादें पा·र
मौन साध जाते हैं,
रात-रातों-रात
सारा खून साफ·र
शिनाख्त मिटा
सुबह फिर पेश करती है
अपने बहुत 'पाक -साफ सूरज को
फिर भी कानो-कान
फैल ही जाती है सच्चाई
जिसे विपक्षी अफवाहें और
उजाला धूमिल करने का
कुचक्र बताता
उलटे आग बबूला हो जाता है सूरज
पक्षी मधुर आवाज में
राग सुनाने लगते है,
नारे लगाते हैं और निरीह जानवर
और जयकारा से गूँज जाता है सारा जंगल
लेकिन फिर-
चकाचौध उजाला बिखेर देने के बाद
अनुभवी चोरों की तरह
शहर की बिजली काट
लंबा गोल माल कर
फिर से गोल हो जाता है सूरज
और रात फिर अपने सूरज को
अपने आंचल में छिपा
काली शाल फेंकती है
धरती पर
ताकि सब सो जाये
मगर इधर
जब से चौकन्ना रहने लगा है
आदमी
निगहबानी करने लगी है दिशाऐं
सूरज डरने लगा है
बेनकाब होने से
और रात भी
आशंकित रहने लगी है
अपने फरेब की
नाकायमाबी पर
आखिर कब तक अपनी काली शाल के सहारे
वह भी बचा पाऐगी
अपने सूरज को
कब तक ?
अमावस
ठुकराए गए
बैरंग पत्र की मानिंद
आरएलओ सी दुनिया में
एक कोने पड़ा हूं
ऐसे फूल भी नहीं हैं
जिसमें कोई गंध
कोई रंग भी नहीं है इस होली में
कोई दिया भी नहीं लहरा रहा है
इस दीवाली में कोई कोलाहल भी नहीं है
इस दशहरे में कोई उल्लास भी नहीं
इस चांदनी में
बस अमावस है
अमावस की विरासत जो जाते-जाते थमाया था
उसे संभाले भटक रहा हूं
तुमको मुबारक हो तुम्हारी चांदनी.
बैरंग पत्र की मानिंद
आरएलओ सी दुनिया में
एक कोने पड़ा हूं
ऐसे फूल भी नहीं हैं
जिसमें कोई गंध
कोई रंग भी नहीं है इस होली में
कोई दिया भी नहीं लहरा रहा है
इस दीवाली में कोई कोलाहल भी नहीं है
इस दशहरे में कोई उल्लास भी नहीं
इस चांदनी में
बस अमावस है
अमावस की विरासत जो जाते-जाते थमाया था
उसे संभाले भटक रहा हूं
तुमको मुबारक हो तुम्हारी चांदनी.
रविवार, 17 अगस्त 2008
गजल
कौन कांटे बो रहा है
इस शहर में,
कौन आकर रो रहा है
इस शहर में
गांव से झुंड आते
हर घड़ी पर,
क्या कोई जलसा बड़ा है
इस शहर में/
अमृत सा बंट रहा है
विष यहां पर
जहर की लाइन लगी क्यों
इस शहर में
एक दिन वदीं पहन आया कोई पिस्तौलवाला
देखते सब रोज तबसे
नयी अर्थी इस शहर में/
अनाज के पहाड़ पर भूखों के ढेर
लेटे यहां आकाश तले,
आदमी हैवान होता जा रहा है
इस शहर में/
इस शहर में,
कौन आकर रो रहा है
इस शहर में
गांव से झुंड आते
हर घड़ी पर,
क्या कोई जलसा बड़ा है
इस शहर में/
अमृत सा बंट रहा है
विष यहां पर
जहर की लाइन लगी क्यों
इस शहर में
एक दिन वदीं पहन आया कोई पिस्तौलवाला
देखते सब रोज तबसे
नयी अर्थी इस शहर में/
अनाज के पहाड़ पर भूखों के ढेर
लेटे यहां आकाश तले,
आदमी हैवान होता जा रहा है
इस शहर में/
बंजर धरती में आशा के बीज
गली-गली में खोजा
कली-कली में खोजा,
शायद 'आकृति कहीं
छिपी हो खोहों में
ढूंढ़-ढूंढ़ हार गया
नदी के आर- पार गया
नहीं नही दिखी तुम
ऐसी क्यो हुई गुम?
कंटकों से उलझती हुई
जिंदगी स्क्ताती गयी
आंगन- पिछवाड़े सब
डंसते रहे नाग से
आज भी भोर जगा
सूरज की खोज में
दीप्ति बुझी- क्षीण मिली
ढूंढता यूं रोज उसे
आशा के कुछ दीप जले
सूनी फिर हुयी गली
रोज-रोज यही दृश्य
जिंदगी है छली-छली
खुल गयी नाव
टकराती लहरें
धूप और छांव
धुंध भरा वातावरण
नजर नहीं आता गांव
शाम है-रात होगी
फिर सुनहली प्रात: होगी
रात भर जागे बटोही
सुबह कैसे जगेगें
दूर जब करना सफर तय /भला कैसे तय करेंगे
शीत खाई मुरझाई पीतवर्ण सी
जीवन वाटिका
बरसात हुये बरसों बीते
कांतिहीन पत्ते
बिखर गये हैं धरा पर
कैसे बटोरें हम
आशा के पीत पर्ण
और दे लगा आग
डर है,बिखरे न हवा में चिंगारी
जल जाए बची-खुची फुनगियां भी
बिलख उठे बचा-खुचा बाग।
कई उतार चढ़ाव के बीच
आखिर तय ही कर लिया है
लहरों को चीरूंगा
खोजूंगा ठांव
आज नहीं तो कल
मिलेगी ही धरती
बोएगें आशा के बीज
ऊसर में,बंजर में
लहराएगें हरियाली
बरसों से पर्ती
पानी बिन तड़पती जो
देखना लहराएगा कल यहीं
हरा -भरा खेत
कली-कली में खोजा,
शायद 'आकृति कहीं
छिपी हो खोहों में
ढूंढ़-ढूंढ़ हार गया
नदी के आर- पार गया
नहीं नही दिखी तुम
ऐसी क्यो हुई गुम?
कंटकों से उलझती हुई
जिंदगी स्क्ताती गयी
आंगन- पिछवाड़े सब
डंसते रहे नाग से
आज भी भोर जगा
सूरज की खोज में
दीप्ति बुझी- क्षीण मिली
ढूंढता यूं रोज उसे
आशा के कुछ दीप जले
सूनी फिर हुयी गली
रोज-रोज यही दृश्य
जिंदगी है छली-छली
खुल गयी नाव
टकराती लहरें
धूप और छांव
धुंध भरा वातावरण
नजर नहीं आता गांव
शाम है-रात होगी
फिर सुनहली प्रात: होगी
रात भर जागे बटोही
सुबह कैसे जगेगें
दूर जब करना सफर तय /भला कैसे तय करेंगे
शीत खाई मुरझाई पीतवर्ण सी
जीवन वाटिका
बरसात हुये बरसों बीते
कांतिहीन पत्ते
बिखर गये हैं धरा पर
कैसे बटोरें हम
आशा के पीत पर्ण
और दे लगा आग
डर है,बिखरे न हवा में चिंगारी
जल जाए बची-खुची फुनगियां भी
बिलख उठे बचा-खुचा बाग।
कई उतार चढ़ाव के बीच
आखिर तय ही कर लिया है
लहरों को चीरूंगा
खोजूंगा ठांव
आज नहीं तो कल
मिलेगी ही धरती
बोएगें आशा के बीज
ऊसर में,बंजर में
लहराएगें हरियाली
बरसों से पर्ती
पानी बिन तड़पती जो
देखना लहराएगा कल यहीं
हरा -भरा खेत
लेबल:
अरविन्द कुमार सिंह,
कविता,
बंजर धरती
दीप टिमटिमाते रहो
टिमटिमाते रहो दीप
इस विराट अंधसागर में
कहीं प्रकाश अस्तित्वहीन न हो जाये
एकाकी
पवन के थपेडो़ के बीच
लहराना
फहराना ही तो
तुम्हारा असली जीवन संघर्ष है
टिमटिमाते रहो
ओ प्रकाश के असली प्रतिनिधि
टिमटिमाते रहो
उजाला कायम रहेगा
तुम्हारे टिमटिमाने तक .
इस विराट अंधसागर में
कहीं प्रकाश अस्तित्वहीन न हो जाये
एकाकी
पवन के थपेडो़ के बीच
लहराना
फहराना ही तो
तुम्हारा असली जीवन संघर्ष है
टिमटिमाते रहो
ओ प्रकाश के असली प्रतिनिधि
टिमटिमाते रहो
उजाला कायम रहेगा
तुम्हारे टिमटिमाने तक .
आम आदमी
दिशायें स्थिर हैं
और हवायें थक कर चूर
सूरज का आतंक
कांच की मानिंद बिखरकर चुभ रहा है
बांटा जा रहा है अंगारा
हर आम आदमी / हर गांव को
पक्षियों की मधुर आवाज़ की जगह
आज रूदन-क्रंदन सुन रहा
भाड़ में चने सा भुनता और उछलता
दिख रहा है कातर आम आदमी
इतना जर्जर-थका नज़र आ रहा है वह
चीख की परंपरा निबाहना भी भूल गया है
और कुछ लोग
जो समग्र वातायन से परिचित है
वे जाने क्यों चुप हैं
जाने क्यों मौन साध गए हैं उनके होठ
जाने कभी खुलेंगे भी
और जाने कब बंद होगा अंगारों का बंटवारा
और वे चीखना भी भूल गए हैं
वे जानते हैं
उनकी हुंकार से
धरा क्या गगन भी प्रकम्पित हो सकता है
भुचाल भी आ सकता है
मगर वे मान गए हैं
उनका चीखना बेकार है, क्योंकि
'आज खास आदमी के पास आम आदमी की
पुकार सुनने का वक्त नही है
और आम आदमी की जिंदगी
आम समस्याओं का हल खोजती
व्यस्त और त्रस्त है
और हवायें थक कर चूर
सूरज का आतंक
कांच की मानिंद बिखरकर चुभ रहा है
बांटा जा रहा है अंगारा
हर आम आदमी / हर गांव को
पक्षियों की मधुर आवाज़ की जगह
आज रूदन-क्रंदन सुन रहा
भाड़ में चने सा भुनता और उछलता
दिख रहा है कातर आम आदमी
इतना जर्जर-थका नज़र आ रहा है वह
चीख की परंपरा निबाहना भी भूल गया है
और कुछ लोग
जो समग्र वातायन से परिचित है
वे जाने क्यों चुप हैं
जाने क्यों मौन साध गए हैं उनके होठ
जाने कभी खुलेंगे भी
और जाने कब बंद होगा अंगारों का बंटवारा
और वे चीखना भी भूल गए हैं
वे जानते हैं
उनकी हुंकार से
धरा क्या गगन भी प्रकम्पित हो सकता है
भुचाल भी आ सकता है
मगर वे मान गए हैं
उनका चीखना बेकार है, क्योंकि
'आज खास आदमी के पास आम आदमी की
पुकार सुनने का वक्त नही है
और आम आदमी की जिंदगी
आम समस्याओं का हल खोजती
व्यस्त और त्रस्त है
लेबल:
अरविन्द कुमार सिंह,
आम आदमी,
कविता
अज्ञात पीड़ा
कंपकपाते सर्द मौसम की तरह
मेरी भीतर का कोई अज्ञात भय
डगमगा देता है
मेरी समुची देह
और विषबुझी हवाओं से आती कोलाहल धुन
छोड़ जाती है एक रिक्त उदासी
ताल के किनारे
रेत के धरौदें बनाते है बच्चे
ख्यालों के अम्बर में
भटकता है एक आदमी
चीलें मछलियां झपटती है और
समग्र परिवेश
एक कैनवास पर उठाकर धर देना चाहता है
एक चित्रकार।
तार-तार होती धोती को
बार-बार पैबद लगाकर
सिलती है एक बेसहारा बेवा
बाढ़-बारिस और तूफान से रातों-रात
विकल्प तलाश लेते है लोग
आसमान के सिर पर चढ़कर
चांद से भी बतियाता है/एक अदना सा आदमी
मगर मेरे भीतर का अज्ञात भय
कभी निकलता क्यों नहीं,
कभी रूकती नहीं हलचलें।
और अविराम खोखला करती है, मेरे अंत: को
एक अज्ञात पीड़ा।
मेरी भीतर का कोई अज्ञात भय
डगमगा देता है
मेरी समुची देह
और विषबुझी हवाओं से आती कोलाहल धुन
छोड़ जाती है एक रिक्त उदासी
ताल के किनारे
रेत के धरौदें बनाते है बच्चे
ख्यालों के अम्बर में
भटकता है एक आदमी
चीलें मछलियां झपटती है और
समग्र परिवेश
एक कैनवास पर उठाकर धर देना चाहता है
एक चित्रकार।
तार-तार होती धोती को
बार-बार पैबद लगाकर
सिलती है एक बेसहारा बेवा
बाढ़-बारिस और तूफान से रातों-रात
विकल्प तलाश लेते है लोग
आसमान के सिर पर चढ़कर
चांद से भी बतियाता है/एक अदना सा आदमी
मगर मेरे भीतर का अज्ञात भय
कभी निकलता क्यों नहीं,
कभी रूकती नहीं हलचलें।
और अविराम खोखला करती है, मेरे अंत: को
एक अज्ञात पीड़ा।
मैं तुम्हें आवाज देता हूं
जब कभी मुझसे टकराता आकर
कोई झोंका सर्द पवन का
मैं तुम्हें आवाज देता हूं।
घूमता हूं,बेमकसद
पेड़ो की झुरमुटों/बागों की सनसनाहट बीच,
भागता हूं दूर-दूर,
शोर और भीड़ भरे चौराहों से/
जब कोई मुर्गा देता है बांक अलस्सुबह,
और कलरव पक्षियों का गूंजता है,
मैं तुम्हें आवाज देता हूं/
जानता हूं नही सुनता,
मेरी भी आवाज कोई ,
लाखों चीखों-कराहटों के बीच
पर मुझे संतोष होता है,
एक बार भी जब तुमको पुकार लेता हूं।
लुहार के घन प्रहार सी,
दीवार घड़ी की टिक -टिक
झन्ना देती है मेरे दिमाग को
जब कोई लावारिस बबूल का काटा,
भेदता है मेरे तलुए को ,
दर्द से तिलमिला मैं फिर
तुम्हें आवाज देता हं।
कोई झोंका सर्द पवन का
मैं तुम्हें आवाज देता हूं।
घूमता हूं,बेमकसद
पेड़ो की झुरमुटों/बागों की सनसनाहट बीच,
भागता हूं दूर-दूर,
शोर और भीड़ भरे चौराहों से/
जब कोई मुर्गा देता है बांक अलस्सुबह,
और कलरव पक्षियों का गूंजता है,
मैं तुम्हें आवाज देता हूं/
जानता हूं नही सुनता,
मेरी भी आवाज कोई ,
लाखों चीखों-कराहटों के बीच
पर मुझे संतोष होता है,
एक बार भी जब तुमको पुकार लेता हूं।
लुहार के घन प्रहार सी,
दीवार घड़ी की टिक -टिक
झन्ना देती है मेरे दिमाग को
जब कोई लावारिस बबूल का काटा,
भेदता है मेरे तलुए को ,
दर्द से तिलमिला मैं फिर
तुम्हें आवाज देता हं।
शहर
अपने चारों ओर
सिर्फ कुहासा
धुंध से लिपटा शहर देखता हूं
चीथड़ो में लिपटा कर फेंके
किसी अवैध बच्चे की तरह
अस्पताल के हर वार्ड से
गूंजती हैं कई दर्दनाक चीखें
रेल गुजरती है
रात के भयावह सन्नाटे को चीरते
बेफिक्र
जंगलो से पहाड़ो से
रेगिस्तान से
और दरिया पार करते
सीटियां बजाती
गाढा़-काला धुंआ फेंकती
समूचे शहर में
दहशत फैलाती हैं.
मुझे लगता है
इस लंबी रेल में बैठा
भयाक्रांत है हर मुसाफिर
जाने क्यो भागते-भागते
पहुंच जाना चाहता है
अपनी मंजिल पर
जाने क्यों
मेरी तरह उन्हें भी
खौफनाक सा लगता है
यह शहर.
सिर्फ कुहासा
धुंध से लिपटा शहर देखता हूं
चीथड़ो में लिपटा कर फेंके
किसी अवैध बच्चे की तरह
अस्पताल के हर वार्ड से
गूंजती हैं कई दर्दनाक चीखें
रेल गुजरती है
रात के भयावह सन्नाटे को चीरते
बेफिक्र
जंगलो से पहाड़ो से
रेगिस्तान से
और दरिया पार करते
सीटियां बजाती
गाढा़-काला धुंआ फेंकती
समूचे शहर में
दहशत फैलाती हैं.
मुझे लगता है
इस लंबी रेल में बैठा
भयाक्रांत है हर मुसाफिर
जाने क्यो भागते-भागते
पहुंच जाना चाहता है
अपनी मंजिल पर
जाने क्यों
मेरी तरह उन्हें भी
खौफनाक सा लगता है
यह शहर.
हिम्मत
बादलों की ओट से झांकता है चांद
टिमटिमाते हैं तारे
रात का साया आकर
जाने लगता है धरती से
फिर से सक्रिय हो जाते हैं श्रमिक हाथ
शोर-शराबा भर जाती है मोटरें
हिलने लगती हैं रेल की पटरियां
और उसके पडोसी मकान
धुऐं निगरानी करने लगते हैं
फिर से शहर की
फिर से तेज हो जाते हैं
आदमी के ठहरे पांव
अपने बिछावन झाड़ता है
कोई भिखारी
डैने फडफ़ड़ाती है बया
गिरगिट से बदलते परिवेश में
लगता है मैं ठहरा हूं
नहीं आगे बढ़ रही है
मेरी जिंदगी
इधर-उधर नहीं उड़ती मेरी जिंदगी
एक नीरस सा ठहराव है
विरासत है मेरे पास अंधे मोड़ की
अपनी मंजिलें तय करते
बढ़ रहे हैं लोग
जिंदगी की दौड़ में
और जाने कितनी होड़ में
भागते-दौड़ते नजर आ रहे हैं
आ रहे हैं,जा रहे हैं
हंस रहे हैं,गा रहे हैं.
पर मेरे खाते में आखिर
ठहराव ही ठहराव क्यों है
मेरे हिस्से की यह विरासत किसे सौंपूं
आखिर मेरे ठहराव का यह युग
कभी तो बदलेगा.
टिमटिमाते हैं तारे
रात का साया आकर
जाने लगता है धरती से
फिर से सक्रिय हो जाते हैं श्रमिक हाथ
शोर-शराबा भर जाती है मोटरें
हिलने लगती हैं रेल की पटरियां
और उसके पडोसी मकान
धुऐं निगरानी करने लगते हैं
फिर से शहर की
फिर से तेज हो जाते हैं
आदमी के ठहरे पांव
अपने बिछावन झाड़ता है
कोई भिखारी
डैने फडफ़ड़ाती है बया
गिरगिट से बदलते परिवेश में
लगता है मैं ठहरा हूं
नहीं आगे बढ़ रही है
मेरी जिंदगी
इधर-उधर नहीं उड़ती मेरी जिंदगी
एक नीरस सा ठहराव है
विरासत है मेरे पास अंधे मोड़ की
अपनी मंजिलें तय करते
बढ़ रहे हैं लोग
जिंदगी की दौड़ में
और जाने कितनी होड़ में
भागते-दौड़ते नजर आ रहे हैं
आ रहे हैं,जा रहे हैं
हंस रहे हैं,गा रहे हैं.
पर मेरे खाते में आखिर
ठहराव ही ठहराव क्यों है
मेरे हिस्से की यह विरासत किसे सौंपूं
आखिर मेरे ठहराव का यह युग
कभी तो बदलेगा.
उथल-पुथल
आकाश -पाताल
एक अदने कैनवास में
कैद कर देने में लगी है
नन्हे चित्रकार की उंगलियां
कन्धों पर भविष्य का
बोझीला बस्ता लादे
अलस्सुबह जाने क्यों
स्कूल जाते हैं बच्चे
जेल से भी ऊंचे
स्कूली अहाते में
छोड़ आती है उन्हे बस
और सांझ को फिर से
उनके मुहल्ले को
वापस लौटा देती है.
टेढ़ी राहों और चौराहों की
भूल भुलैया में
भूलते रहते हैं
मुझ से अनाड़ी पथिक
गलत दिशा बताते हैं
साधु का लबादा ओढ़े कुछ प्रदर्शक
एक नन्ही कोयल की जान से
खेलते हैं तमाम कौवे
कई टुकड़े में बांटता है
एक बच्चे की लाश को हत्यारा
और एक बस्ती थरथरा जाती है
रेल गुजर जाने के बाद.
मैं बूझ नहीं पाता
इस दुनिया का वैचित्र्य
मेरी जिंदगी में क्यों नहीं
क्यों नहीं भरता
कोई आकर मेरे भीतर भी
क्यों नही करता हंगामा
और मचती क्यो नहीं मेरे भीतर भी
उथल पुथल.
एक अदने कैनवास में
कैद कर देने में लगी है
नन्हे चित्रकार की उंगलियां
कन्धों पर भविष्य का
बोझीला बस्ता लादे
अलस्सुबह जाने क्यों
स्कूल जाते हैं बच्चे
जेल से भी ऊंचे
स्कूली अहाते में
छोड़ आती है उन्हे बस
और सांझ को फिर से
उनके मुहल्ले को
वापस लौटा देती है.
टेढ़ी राहों और चौराहों की
भूल भुलैया में
भूलते रहते हैं
मुझ से अनाड़ी पथिक
गलत दिशा बताते हैं
साधु का लबादा ओढ़े कुछ प्रदर्शक
एक नन्ही कोयल की जान से
खेलते हैं तमाम कौवे
कई टुकड़े में बांटता है
एक बच्चे की लाश को हत्यारा
और एक बस्ती थरथरा जाती है
रेल गुजर जाने के बाद.
मैं बूझ नहीं पाता
इस दुनिया का वैचित्र्य
मेरी जिंदगी में क्यों नहीं
क्यों नहीं भरता
कोई आकर मेरे भीतर भी
क्यों नही करता हंगामा
और मचती क्यो नहीं मेरे भीतर भी
उथल पुथल.
लेबल:
अरविन्द कुमार सिंह,
कविता,
मेरा संकल्प
शनिवार, 16 अगस्त 2008
हलचले
चील सा मंडराता रहता है
दिन में
समूचे शहर का धुंआ
मेरे चारो ओर,
जिसके बीच
सतत घुटता हूं
और रात
कब्रिस्तान से अपने प्रियजन को दफना कर
घर वापस लौटते
परिवार सी
बेहद बेचैनी में बीतती है
·िसी दंगाग्रस्त शहर सी
उथल-पुथल होती है
मेरे भीतर
हलचलें आक्रांत करती हैं
साँझ को खदानों से घर वापस लौटे
थके हारे मजूर सी
बेहद थकान उतर जाती है
मेरे जेहन में
अनंत अनुत्तरित सवालों के पिंड
मेरे इर्द-गिर्द
नक्षत्रों की तरह घूमते हैं
और दिन भर
गिट्टियां तोडऩे के बाद
घर लौटी उखड़ती सांसोवाली
बूढे मजूर की तरह
निढ़ाल होकर
पसर जाता हूं
बिस्तरे पर.
दिन में
समूचे शहर का धुंआ
मेरे चारो ओर,
जिसके बीच
सतत घुटता हूं
और रात
कब्रिस्तान से अपने प्रियजन को दफना कर
घर वापस लौटते
परिवार सी
बेहद बेचैनी में बीतती है
·िसी दंगाग्रस्त शहर सी
उथल-पुथल होती है
मेरे भीतर
हलचलें आक्रांत करती हैं
साँझ को खदानों से घर वापस लौटे
थके हारे मजूर सी
बेहद थकान उतर जाती है
मेरे जेहन में
अनंत अनुत्तरित सवालों के पिंड
मेरे इर्द-गिर्द
नक्षत्रों की तरह घूमते हैं
और दिन भर
गिट्टियां तोडऩे के बाद
घर लौटी उखड़ती सांसोवाली
बूढे मजूर की तरह
निढ़ाल होकर
पसर जाता हूं
बिस्तरे पर.
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