मंगलवार, 19 अगस्त 2008

विकल्प

भागदौड़ मची है
शहर से गांव
गांव से शहर के बीच
दौड़ रहे हैं मृगतृष्णा में
रोटियां खोजते लोग
और कुछ
जो रोटियां तलाशते थक गए हैं
पेट थामें फुटबाथों पर लेटे लेटे
भिड़ा रहे जुगत
रोटी हथियाने का .

जिनके पास रोटी है
वे गोलबंद कर रहे हैं
भूखों की फौज
नारे लगा रहे हैं
शासन संवेदनहीन लोगों के पास है
तभी लोग भूखे हैं
तख्त बदल दो ताज बदल दो
तभी मिलेगी
सबको रोटी
सबको रोजी
सबको इज्जत

भूखा पेट
विकल्प देखता है
नारा गूंजता है
तख्त बदल दो
ताज बदल दो
राजा नहीं फकीर है
देश की तकदीर है

कुछ और नारे लगते हैं
मंदिर वहीं बनाऐंगे
भय-भूख से मुक्ति दिलाऐंगे
और कुछ नारे
डीएम एसपी बना रहे हैं

नारो के बीच
गोलबंदी में लगे लोग
रोटियां भी बांटते हैं
और भेड़ बन जाते हैं
तमाम भूखे-नंगे लोग

लुभावने नारों के बीच
भूखे लोग
मंदिर बनवाने के लिए
ताज सौंप देते हैं
मगर यह क्या मंदिर बनना तो दूर
झोपडिय़ां भी उजड़ गयीं
वादो पर जिंदा फौज की

बार बार मिलते हैं नए नायक
बार-बार मिलते हैं नए नारे
हर नारे में होता है राज
बदल दो तख्त और ताज

तख्त और ताज बदलते
धनिया और होरी की तीसरी पीढ़ी
घुटनो में अपना पेट छिपाए
आसमान तले नए नए सपने देख रहे हैं
वे इंतजार कर रहे हैं
पांच साल बीतने का
ताकि एक बार फि र से
धोके बाजो को सबक सिखा सकें .

वादों पर जिंदा फौजें
लगातार बदलती हैं ताज
लाती हैं नया राज
पर उनकी पसलियां मांसल क्यों नहीं होती
भूख प्रबल हो जाती है
तो चीख नगाड़ो के बीच खो जाती है
राजा नहीं फकीर है॥
सारे वादे पूरे हो गए

एक बार-दो बार कितनी बार
एक दशक दो दशक कितने दशक
इंतजार करेंगे
रोटी और बेहतर जीवन का
कभी तो घडा़ फूटेगा
जिनमें भरे हैं ये वादे
कभी तो सुबह होगी
कोई तो विकल्प नि·लेगा
कोई तो अपना असली कमांडर बनेगा।

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

bhai sahab sadar charan sparsh-apki kavitaye padi dil ko choo gayi-apki kavita me ullikhit raja nahi fakir h desh ki takdeer h bhi achhi lagi aj hamara desh aishe hi fakiro ki saja bhugat raha h-khair kavitaye achhi h likhte rahiye. apka anuj dhirendra pratap singh