गुरुवार, 14 अगस्त 2008

इंतजार ख़त्म होने का इंतजार

इंतजार

खूंखार जमींदार के आतंक की तरह
इलाके को कंपाती
रेलगाड़ी गुजरती है
सन्नाटे को चीरती
पूरा गांव दहशत से कानपता है
सर्द पहाड़ की बर्फीली
तूफानी रात की तरह

मां,एक मां
मैली कुचैली पैबंद लगी धोती में
अधपेट
बरसों परदेश गए
अपने अबोध शिशु को
हर गाड़ी में आता महसूसती है
हर डाकिया
उसी का संदेश लाता है
सपने में

उसकी आंखो में है
असीमित प्यार
ममता का महासागर
समाया है उसके भीतर
अगणित शोषण के थपेड़े
उस·े गालों पर पड़ी झुर्रियां
गवाह है,उसके धैर्य
उसकी सहनशीलता की

पर जाने क्यों सब कुछ सहते
अभी भी इंतजार है उसे
इंतजार है
कोपलें फूटेगी, इंतजार ख़त्म होगा ..

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